Tuesday, August 11, 2026
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दहाड़ रही भारत की शान: एशियाई शेरों की संख्या 10 साल में 523 से बढ़कर 891 हुई

विश्व शेर दिवस पर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने संरक्षण की सफलता को सराहा, शेरों का क्षेत्र भी 30 हजार से बढ़कर 35 हजार वर्ग किलोमीटर हुआ

नई दिल्ली, 10 अगस्त 2026।
भारत के वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एशियाई शेरों की बढ़ती संख्या एक बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आई है। वर्ष 2015 में देश में एशियाई शेरों की संख्या जहां 523 थी, वहीं वर्ष 2025 में यह बढ़कर 891 हो गई। यानी एक दशक में शेरों की संख्या में 368 की वृद्धि हुई है। यह उपलब्धि शेर संरक्षण के लिए किए जा रहे निरंतर प्रयासों, बेहतर वन्यजीव प्रबंधन, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी का परिणाम मानी जा रही है।

विश्व शेर दिवस 2026 के अवसर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने शेर संरक्षण में भारत की सफलता की सराहना करते हुए वन्यजीव और जैव-विविधता की सुरक्षा के प्रति देश की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि एशियाई शेरों की संख्या में हुई वृद्धि वन अधिकारियों, संरक्षणवादियों, स्थानीय समुदायों और इस शानदार प्रजाति की रक्षा के लिए लगातार काम कर रहे सभी लोगों के समर्पण को दर्शाती है।

भारत में ही बचा है एशियाई शेरों का प्राकृतिक आवास

एशियाई शेर (Panthera leo persica) दुनिया में पाई जाने वाली शेरों की एक महत्वपूर्ण उप-प्रजाति है। आज इसके जंगली प्राकृतिक आवास का प्रमुख क्षेत्र गुजरात का सौराष्ट्र क्षेत्र, विशेष रूप से गिर और आसपास के वन क्षेत्र हैं। एशियाई शेर भारतीय जैव-विविधता और प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

एक समय एशियाई शेरों की संख्या में भारी गिरावट आई थी और इनके अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा था। संरक्षण के निरंतर प्रयासों के कारण अब इनकी आबादी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। शेरों की बढ़ती संख्या न केवल वन्यजीव संरक्षण की सफलता है, बल्कि भारत की प्राकृतिक विरासत के लिए भी गौरव का विषय है।

दस वर्षों में 70 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि

आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2015 में एशियाई शेरों की संख्या 523 थी। वर्ष 2025 में यह आंकड़ा 891 तक पहुंच गया। इस प्रकार 10 वर्षों में शेरों की संख्या में लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि संरक्षण उपायों के साथ-साथ शेरों के लिए बेहतर पर्यावास, भोजन, पानी, स्वास्थ्य निगरानी और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने की दिशा में किए गए प्रयास प्रभावी साबित हो रहे हैं।

शेरों का क्षेत्र भी हुआ विस्तृत

भारत में शेर संरक्षण की सफलता केवल संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है। वर्ष 2020 से अब तक शेरों के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। वर्ष 2020 में शेरों का क्षेत्र लगभग 30,000 वर्ग किलोमीटर था, जो अब बढ़कर करीब 35,000 वर्ग किलोमीटर हो गया है।

इस विस्तार का अर्थ है कि शेर अब अपने पारंपरिक क्षेत्र से आगे नए और उपयुक्त पर्यावासों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। इससे एक ओर प्रजाति के प्राकृतिक विस्तार की संभावनाएं बढ़ती हैं, वहीं दूसरी ओर मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता भी बढ़ जाती है।

2020 में हुई थी ‘प्रोजेक्ट लायन’ की घोषणा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त 2020 को शेरों के दीर्घकालिक संरक्षण के उद्देश्य से ‘प्रोजेक्ट लायन’ की घोषणा की थी। इस परियोजना का उद्देश्य केवल शेरों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके पूरे पर्यावास और उससे जुड़े जैव-विविधता तंत्र का संरक्षण करना है।

प्रोजेक्ट लायन के तहत शेरों के पर्यावास में सुधार, रोगों की निगरानी, पशु चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करना, वैज्ञानिक तरीके से शेरों की संख्या और गतिविधियों पर नजर रखना तथा तकनीक आधारित संरक्षण उपायों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

बीमारियों की निगरानी और आधुनिक तकनीक पर जोर

शेरों की बड़ी आबादी को सुरक्षित रखने में स्वास्थ्य निगरानी की महत्वपूर्ण भूमिका है। परियोजना के तहत शेरों में संभावित रोगों की पहचान और निगरानी, पशु चिकित्सा सहायता तथा आपातकालीन उपचार की व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है।

इसके साथ ही आधुनिक तकनीक के माध्यम से शेरों की गतिविधियों, संख्या और पर्यावास की वैज्ञानिक निगरानी की जा रही है। इससे वन विभाग को शेरों की स्थिति समझने और जरूरत के अनुसार संरक्षण रणनीति तैयार करने में मदद मिलती है।

स्थानीय समुदायों की भूमिका अहम

शेर संरक्षण की इस सफलता में स्थानीय समुदायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। शेरों का पर्यावास जिन ग्रामीण और वन क्षेत्र के आसपास स्थित है, वहां रहने वाले लोगों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व संरक्षण की आधारशिला है।

स्थानीय लोगों की भागीदारी के माध्यम से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने, जैव-विविधता संरक्षण और संरक्षण से मिलने वाले लाभों में समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है।

विकास और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने भी विश्व शेर दिवस के अवसर पर भारत के संरक्षण प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण पर्यावासों की सुरक्षा, संरक्षण कार्यक्रमों को मजबूत करने और सह-अस्तित्व को प्रोत्साहित करके भारत ने दुनिया को यह दिखाया है कि विकास और प्रकृति एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।

आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे शेरों की दहाड़

एशियाई शेरों की संख्या में हुई वृद्धि भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संरक्षण उपलब्धि है। हालांकि बढ़ती आबादी के साथ शेरों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित पर्यावास, भोजन एवं जल स्रोत, स्वास्थ्य सेवाएं तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करना भविष्य की बड़ी चुनौती होगी।

भारत के लिए अब लक्ष्य केवल शेरों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित, स्वस्थ और दीर्घकालिक अस्तित्व को सुनिश्चित करना है। विश्व शेर दिवस पर यही संकल्प भारत की प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक मजबूत संदेश देता है—एशियाई शेरों की दहाड़ आने वाली पीढ़ियों तक जंगलों में गूंजती रहे।

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