

कृषि औजारों और पशुधन की पूजा के साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व, गेड़ी और पारंपरिक खेलों में दिखता है लोक जीवन का उल्लास
रायपुर, 10 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति में हरेली तिहार का विशेष महत्व है। सावन माह की अमावस्या यानी हरियाली अमावस्या के अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, कृषि परंपरा, पशुधन और प्रकृति के प्रति गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। हरेली को छत्तीसगढ़ का पहला प्रमुख लोक-तिहार भी माना जाता है, जिसके साथ प्रदेश के लोक-पर्वों की श्रृंखला शुरू होती है।
छत्तीसगढ़ में पर्व और त्योहार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे ग्रामीण जीवन, कृषि, प्रकृति और पारंपरिक खेलों से भी गहराई से जुड़े हैं। हरेली का हरापन छत्तीसगढ़ी लोक जीवन, संस्कारों और परंपराओं में प्राकृतिक सौंदर्य का अहसास कराता है।



कृषि औजारों की होती है पूजा
हरेली के दिन किसान अपने कृषि उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा करते हैं। हल, फावड़ा, कुदाल, कुदाली, बसुला, हथौड़ी, आरी, असिया, पैसुल, छूरा और खुर्पी सहित खेती-किसानी में उपयोग होने वाले उपकरणों को धोकर विधि-विधान से पूजा जाता है। चावल के आटे से हाथा लगाया जाता है और चंदन, फूल, धूप-दीप, चीला रोटी तथा श्रीफल अर्पित कर कृषि कार्य में सहयोग देने वाले औजारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
गाय-बैलों की सेवा और स्वास्थ्य की कामना
हरेली पर पशुधन, विशेषकर गाय और बैलों का भी विशेष सत्कार किया जाता है। उन्हें नहलाकर पूजा-अर्चना की जाती है और पारंपरिक रूप से पौष्टिक मिश्रण खिलाया जाता है। ग्रामीण अंचलों में औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार पारंपरिक दवाओं का उपयोग भी पशुओं के स्वास्थ्य के लिए किया जाता रहा है। कृषि प्रधान समाज में बैल सदियों से किसानों के सच्चे साथी और खेती की रीढ़ रहे हैं।
गेड़ी और पारंपरिक खेलों का आकर्षण
हरेली तिहार की पहचान गेड़ी के बिना अधूरी मानी जाती है। बांस से तैयार गेड़ी पर चढ़कर बच्चे और युवा उत्साह के साथ पारंपरिक खेलों में हिस्सा लेते हैं। गेड़ी दौड़, एक पैर पर खड़े होने, एक पैर से कूदने तथा अन्य खेलों का आयोजन भी किया जाता है।
हरेली के अवसर पर नारियल फेंक प्रतियोगिता सहित खो-खो, फुगड़ी, बिल्लस, अत्ती-पत्ती और डंडा पचरंगा जैसे पारंपरिक खेलों का आयोजन गांवों में होता रहा है। गांव का गौठान, स्कूल मैदान और चौक-चौराहे इन खेलों के दौरान उत्सव के केंद्र बन जाते हैं।
नीम की पत्तियों से सुरक्षा की पारंपरिक मान्यता
हरेली के दिन घरों के मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियां लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। ग्रामीण मान्यता के अनुसार इससे घर को बुरी नजर और बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। नीम के औषधीय गुणों के कारण भी ग्रामीण जीवन में इसका विशेष महत्व रहा है।
छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की खुशबू से महकता है पर्व
हरेली के अवसर पर घरों में पारंपरिक छत्तीसगढ़ी पकवान बनाए जाते हैं। गुड़हा चीला, अईरसा, चौसेला, बोबरा, गुलगुला भजिया, सोहारी, बड़ा, ठेठरी और खुरमी जैसे व्यंजनों का विशेष महत्व है। इन पकवानों का भोग कृषि औजारों और गोधन को भी लगाया जाता है।
प्रकृति और परंपरा के संरक्षण का संदेश
हरेली तिहार केवल पूजा और उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। यह पर्व संदेश देता है कि जिस प्रकृति और पशुधन से मानव को जीवन, भोजन और आजीविका मिलती है, उसके संरक्षण और सम्मान की जिम्मेदारी भी समाज की है।
आज के दौर में पारंपरिक खेलों और लोक-संस्कृति को बढ़ावा देने के प्रयासों से हरेली जैसे पर्वों की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। गेड़ी दौड़ जैसे पारंपरिक खेल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और ग्रामीण संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बन रहे हैं।
हरेली का हरापन छत्तीसगढ़ के खेतों, खलिहानों के साथ लोगों के जीवन में भी खुशहाली, स्वास्थ्य और समृद्धि का संदेश लेकर आए—यही इस लोकपर्व की मूल भावना है।

