
प्रणय मिश्रा
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में उत्पन्न भू-राजनीतिक संकट और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी (रसोई गैस) की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला। इसके बावजूद भारत सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देते हुए रसोई गैस की कीमतों को नियंत्रित रखा तथा देश में कहीं भी गैस की कमी नहीं होने दी। सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने इसके लिए हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ वहन किया।
46 प्रतिशत तक बढ़ी अंतरराष्ट्रीय एलपीजी कीमत
भारत अपनी कुल एलपीजी आवश्यकता का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है। इसकी कीमत मुख्य रूप से सऊदी अरामको द्वारा निर्धारित सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (सीपी) पर निर्भर करती है। फरवरी 2026 में एलपीजी का 50:50 प्रोपेन-ब्यूटेन मिश्रित मूल्य लगभग 542.50 अमेरिकी डॉलर प्रति टन था। लेकिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान के बाद अप्रैल में यह बढ़कर 775 डॉलर प्रति टन पहुंच गया। जून 2026 तक यह और बढ़कर लगभग 790 डॉलर प्रति टन हो गया। इस प्रकार फरवरी से जून के बीच अंतरराष्ट्रीय एलपीजी बेंचमार्क में लगभग 46 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
घरेलू उपभोक्ताओं को नहीं दिया गया बढ़ी लागत का बोझ
अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी वृद्धि के कारण 14.2 किलोग्राम के एक घरेलू एलपीजी सिलेंडर की वास्तविक आयात-आधारित लागत 1,600 रुपये से अधिक पहुंच गई। इसके बावजूद सामान्य उपभोक्ताओं के लिए घरेलू सिलेंडर की कीमत लगभग 942 रुपये और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए प्रभावी कीमत मात्र 642 रुपये रखी गई। इसका अर्थ है कि सरकार और तेल कंपनियां प्रत्येक घरेलू सिलेंडर पर लगभग 700 रुपये का नुकसान वहन कर रही हैं।
कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में दिखा असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी कीमतों का प्रभाव कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। होटल, रेस्तरां और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में उपयोग होने वाले 19 किलोग्राम के कमर्शियल सिलेंडर की कीमत दिल्ली में बढ़कर 3,113.50 रुपये तक पहुंच गई। यह लगभग 164 रुपये प्रति किलोग्राम के बराबर है। इसके मुकाबले घरेलू उपभोक्ता लगभग 66 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से गैस प्राप्त कर रहे हैं।
होर्मुज़ संकट के बावजूद नहीं हुई आपूर्ति में कमी
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। भारत की एलपीजी जरूरतों का लगभग 54 प्रतिशत हिस्सा भी इसी मार्ग से आता है। संकट के दौरान अधिकांश देशों के जहाजों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन भारत ने अपने ऊर्जा आयात को जारी रखा। भारतीय झंडे वाले टैंकर लगातार इस मार्ग से गुजरते रहे और देश के बंदरगाहों तक कच्चा तेल तथा एलपीजी पहुंचाते रहे। परिणामस्वरूप देश में किसी भी पेट्रोलियम उत्पाद की कमी नहीं हुई।
घरेलू उत्पादन में 60 प्रतिशत से अधिक वृद्धि
आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भारत ने घरेलू एलपीजी उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की। संकट से पहले जहां उत्पादन लगभग 32 हजार मीट्रिक टन था, वहीं इसे बढ़ाकर 52 हजार मीट्रिक टन तक पहुंचाया गया। साथ ही अमेरिका, कनाडा और अल्जीरिया जैसे देशों से भी अतिरिक्त एलपीजी की व्यवस्था की गई, जिनकी आपूर्ति होर्मुज़ मार्ग पर निर्भर नहीं थी।
दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त कदम
सरकार ने घरेलू एलपीजी के व्यावसायिक उपयोग को रोकने के लिए निगरानी भी बढ़ाई। ओटीपी आधारित डिलीवरी सत्यापन प्रणाली को लगभग 90 प्रतिशत तक लागू किया गया। इससे सब्सिडी वाले घरेलू सिलेंडरों के दुरुपयोग पर काफी हद तक रोक लगी। साथ ही उपभोक्ताओं को पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया, जिससे सिलेंडरों पर दबाव कम हो सके।
60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचा नुकसान
अंतरराष्ट्रीय कीमतों और नियंत्रित घरेलू कीमतों के बीच के अंतर को ‘अंडर-रिकवरी’ कहा जाता है। यह सब्सिडी से अलग व्यवस्था है। वित्त वर्ष 2024-25 में घरेलू एलपीजी पर कुल अंडर-रिकवरी 41,338 करोड़ रुपये थी, जो बढ़कर 2025-26 में लगभग 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इस वित्तीय दबाव को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों को 30,000 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति देने की मंजूरी दी है।
उज्ज्वला लाभार्थियों को अतिरिक्त राहत
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के अंतर्गत 10.58 करोड़ से अधिक परिवारों को प्रति सिलेंडर 300 रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी सीधे बैंक खातों में भेजी जा रही है। इसके कारण उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को मिलने वाला सिलेंडर अंतरराष्ट्रीय लागत की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत सस्ता पड़ रहा है।
सरकार की प्राथमिकता रही उपभोक्ताओं को राहत
वैश्विक बाजार में एलपीजी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया संकट के बावजूद भारत सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करने को प्राथमिकता दी। आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के माध्यम से सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि देश के नागरिकों को रसोई गैस की कमी का सामना न करना पड़े और उन्हें विश्व के कई देशों की तुलना में कम कीमत पर एलपीजी उपलब्ध होती रहे।

