Thursday, April 23, 2026
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बच्चों की आंखों की जांच में लापरवाही भारी, सही उम्र पर टेस्ट जरूरी


कोरबा/स्वास्थ्य डेस्क:
बच्चों की आंखों की सेहत को लेकर डॉक्टरों ने अहम सलाह दी है। विशेषज्ञों के अनुसार नवजात शिशु की आंखों का पहला चेकअप जन्म के तुरंत बाद ही कर लिया जाता है, ताकि किसी भी जन्मजात समस्या का समय रहते पता लगाया जा सके।
इसके बाद 6 महीने से 1 साल के बीच आंखों की बेसिक जांच कराना जरूरी माना गया है। वहीं 3 से 5 साल की उम्र को विजन डेवलपमेंट का सबसे महत्वपूर्ण समय बताया गया है। इस दौरान नियमित जांच कराने से नजर कमजोर होने या भेंगापन जैसी समस्याओं का इलाज शुरुआती चरण में ही संभव है।
डॉक्टरों के मुताबिक अगर बच्चा बार-बार आंखें मलता है, टीवी या मोबाइल बहुत करीब से देखता है, सिरदर्द की शिकायत करता है या पढ़ाई में ध्यान नहीं लगा पाता—तो यह आंखों की कमजोरी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत जांच करानी चाहिए।
समय पर इलाज न मिलने से बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) और एंब्लायोपिया (लेजी आई) जैसी गंभीर समस्याएं बढ़ सकती हैं, जो बाद में स्थायी रूप ले सकती हैं।
आजकल मोबाइल और टीवी का बढ़ता उपयोग भी बच्चों की आंखों पर बुरा असर डाल रहा है। स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी उनकी दृष्टि को प्रभावित कर रही है, जिससे कम उम्र में ही चश्मा लगने के मामले बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों की सलाह:
5 साल की उम्र के बाद हर 1 से 2 साल में बच्चों की आंखों की नियमित जांच कराना बेहद जरूरी है। अच्छी नजर न केवल पढ़ाई में मदद करती है, बल्कि बच्चे के समग्र विकास के लिए भी अहम भूमिका निभाती है।

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