, 15 जुलाई 2026




अपनी मनमोहक खुशबू के लिए प्रसिद्ध केवड़ा (पैंडनस) का पौधा केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि इसका इतिहास भी बेहद प्राचीन है। वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि यह पौधा भारतीय उपमहाद्वीप में कम से कम 2.4 करोड़ (24 मिलियन) वर्ष से मौजूद है। यानी यह पौधा मानव सभ्यता के उद्भव से भी लाखों वर्ष पुराना है और इसका अस्तित्व हिमालय के पूर्ण निर्माण से भी पहले का है।
यह महत्वपूर्ण शोध विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (BSIP), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने किया है। अध्ययन के परिणाम प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका Geobios में प्रकाशित हुए हैं।
असम के कोयला क्षेत्र में मिले 2.4 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म
वैज्ञानिक हर्षिता भाटिया और गौरव श्रीवास्तव ने असम के माकुम कोयला क्षेत्र से लगभग 24 मिलियन वर्ष पुराने चार जीवाश्म पत्तों की खोज की। इन पत्तों का सूक्ष्म अध्ययन करने पर पाया गया कि उनकी संरचना आज के केवड़ा पौधे से लगभग पूरी तरह मेल खाती है।
जीवाश्मों में आधुनिक केवड़ा की तरह:
- लंबी तलवार जैसी पत्तियां,
- समानांतर नसें,
- किनारों पर नुकीले कांटे,
- तथा अन्य विशिष्ट संरचनाएं स्पष्ट रूप से दिखाई दीं।
दुनिया में बेहद दुर्लभ हैं केवड़ा के जीवाश्म
वैज्ञानिकों के अनुसार केवड़ा परिवार (पैंडानेसी) के जीवाश्म दुनिया भर में बहुत कम मिले हैं। इसलिए असम से मिली यह खोज वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
शोधकर्ताओं ने इन जीवाश्मों की तुलना दुनिया भर में संरक्षित आधुनिक केवड़ा प्रजातियों और पुराने जीवाश्म अभिलेखों से की, जिससे पुष्टि हुई कि यह वास्तव में केवड़ा परिवार का ही पौधा है।
भारत बना प्राचीन पौधों का सुरक्षित आश्रय
अध्ययन से पता चलता है कि करोड़ों वर्ष पहले जब वैश्विक जलवायु ठंडी होने लगी, तब यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे क्षेत्रों से केवड़ा परिवार के पौधे धीरे-धीरे समाप्त हो गए। लेकिन भारत का उष्णकटिबंधीय वातावरण इनके लिए सुरक्षित आश्रय साबित हुआ, जहां यह पौधा आज तक जीवित बना हुआ है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत केवल जैव विविधता का केंद्र ही नहीं, बल्कि कई प्राचीन पौधों की प्रजातियों का “प्राकृतिक शरणस्थल” भी रहा है।
केवल खुशबू ही नहीं, संस्कृति से भी जुड़ा है केवड़ा
केवड़ा का उपयोग भारत में सदियों से:
- मिठाइयों और शरबतों में,
- इत्र और सुगंधित उत्पादों में,
- आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा में,
- तथा मंदिरों में पूजा-अर्चना के दौरान किया जाता है।
अब यह वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हो गया है कि यह पौधा भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन प्राकृतिक धरोहर का हिस्सा है।
जलवायु परिवर्तन को समझने में मिलेगी मदद
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शोध केवल एक पौधे के इतिहास तक सीमित नहीं है। इससे यह समझने में भी मदद मिलेगी कि करोड़ों वर्षों में जलवायु परिवर्तन के दौरान पौधों ने स्वयं को कैसे अनुकूलित किया और भारत ने जैव विविधता को संरक्षित रखने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह अध्ययन भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।

