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बांकी मोंगरा से हसदेव अरण्य तक, हरियाली पर बढ़ता संकट
– सीजी न्यूज़ हब संपादकीय डेस्क
प्रणय मिश्रा

विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिवस नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को याद दिलाने का अवसर है। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। विकास की दौड़ में मानव ने अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन इन उपलब्धियों की कीमत प्रकृति को चुकानी पड़ रही है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और हरित वातावरण केवल पुस्तकों तक सीमित होकर रह जाएगा।
छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने भरपूर आशीर्वाद दिया है। राज्य के विशाल वन क्षेत्र, नदियां, पर्वत और वन्यजीव इसे देश के सबसे समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्रों में शामिल करते हैं। बस्तर के घने जंगल, कांगेर घाटी, अचानकमार और हसदेव अरण्य केवल वन क्षेत्र नहीं बल्कि लाखों जीवों, वनस्पतियों और स्थानीय समुदायों के जीवन का आधार हैं। ये क्षेत्र राज्य के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हालांकि बीते कुछ वर्षों में विकास परियोजनाओं, खनन गतिविधियों और बढ़ते शहरीकरण के कारण वन क्षेत्रों पर दबाव लगातार बढ़ा है। हसदेव अरण्य सहित कई क्षेत्रों में जंगलों के संरक्षण को लेकर चिंताएं सामने आई हैं। जंगलों का सिकुड़ना केवल पेड़ों का कम होना नहीं है, बल्कि यह पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वन्यजीवों के आवास नष्ट होते हैं, जल स्रोत प्रभावित होते हैं और जैव विविधता का संतुलन बिगड़ने लगता है।
कोरबा जिले के बांकी मोंगरा और आसपास के क्षेत्रों की स्थिति भी चिंता पैदा करती है। कभी घने बांस के झुरमुटों और प्राकृतिक हरियाली के लिए पहचाने जाने वाले क्षेत्रों में अब धीरे-धीरे बांस के पेड़ों की संख्या कम होती दिखाई दे रही है। बांस केवल एक वन उत्पाद नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक जीवनशैली और पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बांस के वन मिट्टी संरक्षण, भूजल संरक्षण और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका लगातार कम होना भविष्य के लिए गंभीर संकेत है।
इसी प्रकार बांकी मोंगरा और आसपास के क्षेत्रों में कभी बड़ी संख्या में दिखाई देने वाले आम और कटहल के पेड़ भी धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। जिन बाग-बगीचों और घरों के आसपास कभी फलदार वृक्षों की हरियाली दिखाई देती थी, वहां अब कंक्रीट के ढांचे और बढ़ता शहरी विस्तार नजर आने लगा है। आम और कटहल जैसे वृक्ष केवल फल देने वाले पेड़ नहीं हैं, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी, पक्षियों के आश्रय और प्राकृतिक तापमान नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके घटने से क्षेत्र की हरियाली और जैव विविधता दोनों प्रभावित हो रही हैं।
आज पर्यावरणीय संकट का एक बड़ा कारण बदलती सामाजिक मानसिकता भी है। सुविधाभोगी जीवनशैली और उपभोक्तावाद ने प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को कम कर दिया है। प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग, जल और बिजली की अनावश्यक बर्बादी, वृक्षों की कटाई और हरित क्षेत्रों पर अतिक्रमण जैसी प्रवृत्तियां पर्यावरण के लिए घातक साबित हो रही हैं। लोग अक्सर विकास को केवल भवनों, सड़कों और उद्योगों से जोड़कर देखते हैं, जबकि वास्तविक विकास वह है जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखे।
पारिस्थितिक तंत्र प्रकृति की वह अद्भुत व्यवस्था है जिसमें वन, जल, भूमि, जीव-जंतु, पक्षी, वनस्पतियां और मानव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब किसी क्षेत्र में वृक्षों की संख्या कम होती है तो इसका प्रभाव केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। वर्षा चक्र, भूजल स्तर, तापमान, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य तक प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन बनाने की आवश्यकता है।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब छत्तीसगढ़ में भी महसूस किए जा रहे हैं। अनियमित वर्षा, बढ़ती गर्मी, लंबे सूखे और अचानक आने वाली अतिवृष्टि किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। यदि वन क्षेत्र लगातार कम होते रहे तो भविष्य में इन समस्याओं की गंभीरता और बढ़ सकती है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर केवल वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि लगाए गए पौधों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जाए। बांकी मोंगरा सहित पूरे छत्तीसगढ़ में बांस, आम, कटहल और अन्य स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण एवं पुनरोपण के लिए विशेष अभियान चलाने होंगे। स्थानीय समुदायों, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन को मिलकर इस दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे।
प्रकृति और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। लेकिन विकास का कोई भी मॉडल तब तक सफल नहीं माना जा सकता जब तक वह पर्यावरणीय संतुलन को सुरक्षित न रखे। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल पर्यावरण दिवस मनाने तक सीमित न रहें, बल्कि प्रकृति संरक्षण को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।
क्योंकि हर कटता हुआ पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का एक हिस्सा है। और हर बचाया गया पेड़ एक सुरक्षित, हरित और स्वस्थ कल की उम्मीद।
— सीजी न्यूज़ हब संपादकीय डेस्क
प्रणय मिश्रा



